Friday, October 19

Temple

जगदलपुर एवं देवी दंतेश्वरी का मंदिर

जगदलपुर एवं देवी दंतेश्वरी का मंदिर

Place to Visit, Temple
जगदलपुर छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले का एक प्रसिद्ध शहर है यह इस जिले  मुख्यालय भी है  यहाँ का तापमान सामन्यतः कम ही होता है यहाँ अनेक दर्शनीय स्थल है यहाँ जगन्नाथ पीठ का भव्य मंदिर एवं देवी दंतेश्वरी का मंदिर है। जगदलपुर का दशहरा बहुत मशहूर है, जिसकी भव्यता देखते ही बनती है। इसे देखने के लिए देश विदेश से अनेक पर्यटक आते हैंजगदलपुर के आस-पास लगभग 40.00 किलोमीटर की दूरी पर चित्रकोट जलधारा, चित्रधारा, ताम्रघूमर, तीरथगढ़ आदि पर्यटन स्थल हैं जिनका प्राकृतिक सौंन्दर्य अपनी छटा इस प्रकार बिखरता है कि मन मुग्ध हो जाता है। देवी दंतेश्वरी का मंदिर जो यहाँ से लगभग 90.00 किलोमीटर की दूरी पर दंतेवाडा जिला में है। देवी दंतेश्वरी का मंदिर अपनी प्रसिद्व के लिए जाना जाता है। एेसा कहा जाता है कि यहाँ दर्शन करने से मुरादें पूरी हो जाती है और निवासियों का विश्वास अटल है  जगदलपुर को चैराहों का शहर भी कहा जाता

मावली माता का भव्य मंदिर जगदलपुर

Bastar Band, Place to Visit, Temple
माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास ही उनकी छोटी बहन माँ भुनेश्वरी का मंदिर है। माँ भुनेश्वरी को मावली माता, माणिकेश्वरी देवी के नाम से भी जाना जाता है। माँ भुनेश्वरी देवी आंध्रप्रदेश में माँ पेदाम्मा के नाम से विख्यात है और लाखो श्रद्धालु उनके भक्त हैं। छोटी माता भुवनेश्वरी देवी और मांई दंतेश्वरी की आरती एक साथ की जाती है और एक ही समय पर भोग लगाया जाता है। लगभग चार फीट ऊंची माँ भुवनेश्वरी की अष्टड्ढभुजी प्रतिमा अद्वितीय है। मंदिर के गर्भगृह में नौ ग्रहों की प्रतिमाएं है। वहीं भगवान विष्णु अवतार नरसिंह, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं प्रस्थापित हैं। कहा जाता है कि माणिकेश्वरी मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी में हुआ। संस्कृति और परंपरा का प्रतीक यह छोटी माता का मंदिर नवरात्रि में आस्था और विश्वास की ज्योति से जगमगा उठता है।
माँ दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास

माँ दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास

Bastar Band, Place to Visit, Temple, Uncategorized
छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से करीब तीन सौ अस्सी किलोमीटर दूर दंतेवाडा नगर स्थित है। आंध्रप्रदेश के वारंगल राज्य के प्रतापी राजा अन्नमदेव ने यहां आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी और माँ भुवनेश्वरी देवी की प्रतिस्थापना की। वारंगल में माँ भुनेश्वरी माँ पेदाम्मा के नाम से विख्यात है। एक दंतकथा के मुताबिक वारंगल के राजा रूद्र प्रतापदेव जब मुगलों से पराजित होकर जंगल में भटक रहे थे तो कुल देवी ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि माघपूर्णिमा के मौके पर वे घोड़े में सवार होकर विजय यात्रा प्रारंभ करें और वे जहां तक जाएंगे वहां तक उनका राज्य होगा और स्वयं देवी उनके पीछे चलेगी, लेकिन राजा पीछे मुड़कर नहीं देखें। वरदान के अनुसार राजा ने वारंगल के गोदावरी के तट से उत्तर की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ की । राजा रूद्र प्रताप देव के अपने पीछे चली आ रही माता का अनुमान उनके पायल के घुँघरूओं से उनके साथ होने का अनुमान

शिवानी मंदिर कांकेर

Bastar Band, Place to Visit, Temple
शिवानी मंदिर, छत्तीसगढ़ राज्य में सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर दुनिया भर मे एक लंबे समय के बाद पर्यटकों को आकर्षित किया है। मंदिर की संरचना निर्माण मे मंदिरों की प्राचीन शैली चित्रण और जातीय और पारंपरा को दर्शाता है। शिवानी मंदिर, कांकेर शिवानी मां मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। यह माना जाता है कि इस मंदिर में देवी के देवी, अर्थात् दुर्गा मां और मां काली का एक संयोजन है। कांकेर एक सुंदर शहर है जो कांकेर जिले में एक नगर पालिका है। कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है। जिले के माध्यम से पांच नदियों के प्रवाह है हतकुल नदी, महानदी नदी, तुरु नदी, सिन्दुर नदी और दूध नदी शामिल हैं। जिले की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। क्षेत्र की मुख्य फसल चावल है, और अन्य महत्वपूर्ण फसलें है गन्ना, चना, गेहूं, भुट्टा, मूंग, तिल्ली, और कोदो। कांकेर जिले के शिवानी मंदिर मे द

भैरव मंदिर

Temple
मान्यता के मुताबिक साल में दो बार खुलने वाले भैरम मंदिर में टैक्स के रूप में अब नरबलि की जगह बकरे, मुर्गे की बलि दिए जानें के साथ ही चांवल की भेट दी जाती हैं. मंदिर में नरबलि का खौफ मंदिर के आसपास इस कदर दिखाई देता हैं कि पूरा मंदिर परिसर वीरान ही नजर आता है. केवल साल के दो दिन खुलने पर ही मंदिर की साफ सफाई होती हैं और पूजा पाठ करने के बाद शाम से पहले मंदिर बंद हो जाता है. भैरव मंदिर की सबसे बड़ी खासियत ये भी है कि इस मंदिर में विराजमान एक दर्जन देवी देवताओं को बस्तर दशहरा में जगदलपुर में आयोजित किए जानें वाले समारोह में स्थान नहीं दिया जाता है.सालभर में दो बार खुलने वाले भैरम मंदिर की खुलने की सूचना गांव का पुजारी 22 गांव को देता हैं, जिसमें लोग शामिल होते हैं. नरबलि के चलते भैरम मंदिर इलाकें में पूरी तरह से सन्नाटा पसरा होता है. भैरब मंदिर के आसपास भी भयावता की कहानी आसपास के पेड़ों की
छर्रे-मर्रे जल प्रपात कंकेर

छर्रे-मर्रे जल प्रपात कंकेर

Bastar Band, Temple
छर्रे-मर्रे झरना, कांकेर एक सोलह मीटर उच्च जोगी नदी पर टेढ़ी-मेढ़ी झरना है। भारत के छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में छर्रे-मर्रे झरना अंतगढ़ से 17 किलोमीटर दूर आमबेरा के रास्ते पर है। यहा दुनिया भर से और भारत भर से हर साल हजारों पर्यटकों के लिए यह सुंदर और सुरम्य झरना है। यह झरना निश्चित रूप से तुम्हारी आँखों के लिए एक दावत है। छर्रे-मर्रे झरना, कांकेर की एक जोगी नदी पर स्थित टेढ़ी-मेढ़ी झरना है। कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है। यह पहले पुराने बस्तर जिले का एक हिस्सा है। पांच नदिया जिले कि प्रवाह के माध्य से गुजरती हैं। ये पांच नदिया महानदी नदी, तुरु नदी, सिन्दुर नदी, दूध नदी और हतकुल नदी हैं। जिले की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है और क्षेत्र की मुख्य फसल चावल है। क्षेत्र के अन्य महत्वपूर्ण फसलें हैं - गन्ना, भुट्टा, चना, कोदो, मूंग, तिल्ली और गेहूं हैं। झरना छर्रे-मर्रे, छ
शिवानी माँ मंदिर कांकेर

शिवानी माँ मंदिर कांकेर

Bastar Band, Place to Visit, Temple
शिवानी मंदिर, छत्तीसगढ़ राज्य में सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर दुनिया भर मे एक लंबे समय के बाद पर्यटकों को आकर्षित किया है। मंदिर की संरचना निर्माण मे मंदिरों की प्राचीन शैली चित्रण और जातीय और पारंपरा को दर्शाता है। शिवानी मां मंदिर को शिवानी मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ में सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और दो देवी दुर्गा और काली को समर्पित है। खड़ी आधा भाग देवी काली को समर्पित है जबकि शेष भाग में देवी दुर्गा को समर्पित है। यहां के लोग मानते हैं कि इन दो श्रद्धालु देवीयों का एक संयोजन हैं। पूरे विश्व में केवल 2 ऐसी संरचनाएं हैं उनमें से एक कांकेर में है और दूसरा कोलकाता में स्थित है। कांकेर छत्तीसगढ़ के दक्षिणी छोर पर स्थित है और जिले के माध्यम से गुजरने वाली 5 नदियां हैं, जैसे दूध नदी, महानदी, सिंदूर नदी, हटकुल और तुरु।
Jagannath temple jagdalpur

Jagannath temple jagdalpur

Bastar Band, Temple
Jagannath sanctuary is thought to be one of the great Gods and is firmly accepted and gone by guests. The sanctuaries are available in all states and urban communities of India. Likewise, Jagannath sanctuary is additionally present in the province of Chhattisgarh. Standing tall in the city, it is additionally one of the most established sanctuaries in the town. The Jagannath sanctuaries are committed to Lord Jagannath, Subhadra and Bakbhadra, and are a similar everywhere throughout the nation. The Jagannath sanctuary in Bastar is close to the Mavli sanctuary in Singha Dwar. The Jagannath sanctuary praises its most amazing celebration, the Rath Yatra. The Rath Yatra is praised all finished India and is committed to Lord Jagannath. The rath Yatra is one of the greatest celebrations in th...

Battisa Temple

Temple
 दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 31 किमी दूर बारसूर का ऐतिहासिक बत्तीसा मंदिर 32 खंबों पर टिका है। यहां प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण ईस्वी सन्‌ 1030 में नागवंशीय नरेश सोमेश्वरदेव ने अपनी रानी के लिए करवाया था।यहां के दो शिवालय में राजा और रानी शिव की अलग-अलग आराधना करते थे। दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं। किवदंती है कि राजा बलि से तीन पग जमीन मांगने के बाद भगवान विष्णु के वामन अवतार ने उसे पाताल में पहुंचा दिया था।इसके बाद बलि पुत्र बाणासूर ने दंडकारण्य वनांचल में बाणासूरा नाम नई राजधानी बसाई थी। श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्घ के बाणासूरा प्रवेश के बाद से यहां का पतन शुरू हुआ। 895 वर्ष पुराने इस मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 2003 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराया गया था।राजधानी से दूरी 395 किलोमीटर, विशेषता यहां विश्व की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा है। यहां स्
छत्तीसगढ़ बस्तर के दशहरा की अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ बस्तर के दशहरा की अनोखी परंपरा

Bastar Band, Temple
  बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। आदिवासियों ने इसके प्रारंभिक काल से ही बस्तर के राजाओं को हर प्रकार से सहयोग प्रदान किया। जिसका यह परिणाम निकला कि बस्तर दशहरा का विकास एक ऐसी परंपरा के रूप में हुआ जिसका सिर्फ़ आदिवासी समुदाय ही नहीं समस्त छत्तीसगढ़वासी गर्व करते हैं। इस पर्व में अन्नदान पशुदान और श्रमदान की जो परंपरा विकसित हुई उससे साबित होता है कि हमारे समाज में सामुदायिक भावना की बुनियाद अत्यंत मज़बूत है। भूतपूर्व बस्तर राज्य में परगनिया माझी, माँझी मुकद्दम और कोटवार आदि ग्रामीण दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले ही मनोयोग से ही जुट जाया करते थे। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था।